Friday, April 20, 2012

सिनेमा को नए रंग दे रही महिलाएं


‘सिनेमा महिलाओं के बस की बात नहीं है..’ साल 1913 में भारत में मोशन पिक्चर्स की शुरुआत के साथ इस धारणा ने भी पैठ बना ली थी। भारतीय सिनेमा पर यह पूर्वाग्रह लंबे समय तक हावी रहा। आलम यह था कि महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष निभाते। हालांकि भारतीय सिनेमा के शैशवकाल में ही फिल्म मोहिनी भस्मासुर में एक महिला कमलाबाई गोखले ने अभिनय कर नई शुरुआत की, लेकिन सिनेमा अब भी महिलाओं के लिए दूर की कौड़ी थी। कमलाबाई, चरित्र अभिनेता विक्रम गोखले की परदादी थीं, जिन्होंने बाद में कई फिल्मों में पुरुष किरदार भी निभाए। बाद में फिल्मों में महिलाओं के काम करने का सिलसिला बढ़ता गया और अब यह कोई नहीं कहता कि सिनेमा महिलाओं के बस की बात नहीं।


लाइट, कैमरा, एक्शन..

फ्लैशबैक की बात छोड़ वर्तमान में आते हैं; अभिनय छोड़कर कैमरे के पीछे चलते हैं। शुरुआत फिल्म निर्देशन से करें तो इस फेहरिस्त का पहला नाम जो जहन में कौंधता है वो सई परांजपे का है। सई ऐसी फिल्मकार हैं, जिनमें विविधता है, जिन्होंने अपने निर्देशन से हमेशा हैरान किया है। जादू का शंख, स्पर्श, चश्मेबद्दूर, कथा या दिशा सरीखी फिल्में इसकी बानगी हैं। सई की फिल्में आम जीवन को गहरे छूती हैं। इन फिल्मों में कहीं नहीं लगता कि हम वास्तविक जीवन से इतर कुछ देख सुन रहे हैं। सिनेमा में योगदान के लिए सई परांजप को 1996 में पद्मभूषण से नवाजा जा चुका है। अगला नाम अपर्णा सेन का है। अपर्णा बंगाली सिनेमा की सशक्त अभिनेत्री रही हैं। एक अभिनेत्री केवल अभिनय के लायक होती है.., इस मिथक की धज्जियां अपर्णा ने निर्देशन की कमान संभालकर उड़ाईं। उन्होंने अपनी पहली फिल्म 36 चौरंगी लेन से यह भी साबित कर दिया कि निर्देशन के मामले में महिलाएं कहीं कमतर नहीं। अपर्णा की परोमा, मिस्टर एंड मिसेज अय्यर, 15 पार्क एवेन्यू, द जैपनीज वाइफ और इति मृणालिनी जैसी नायाब फिल्में सिनेमा प्रेमियों के सर चढ़कर बोली हंै। अपर्णा की हर आने वाली फिल्म का शिद्दत से इंतजार रहता है उनके प्रशंसकों को।


अब उस महिला की बात, जो न सिर्फ फिल्में बनाती है, बल्कि फिल्मी कलाकारों को अपने इशारों पर भी नचाती है। वे सरोज खान के बाद इंडस्ट्री की लोकप्रिय कोरियोग्राफर हैं। यहां बात फराह खान की हो रही है, जो एक अच्छी फिल्म निर्देशक भी हैं। फराह अपने खास अंदाज और बेबाक शैली के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने मैं हूं ना और ओम शांति ओम जैसी फिल्मों से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया है। उनकी फिल्में व्यावसायिक स्तर पर भी अच्छी साबित हुई हैं।


जोया अख्तर असीम संभावनाओं से भरी हैं। रचनात्मकता भले उन्हें विरासत में मिली हो, लेकिन केवल दो फिल्मों से वे खुद को काबिल फिल्मकार के रूप में स्थापित कर चुकी हैं। लक बाय चांस और ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा ऐसी फिल्में हैं, जो शायद जोया जैसी युवा महिला निर्देशक ही सोच बुन सकती हैं। जोया ने फिल्मों को एक नए विस्तार के साथ सामने रखा है, खासकर रिश्तों के यथार्थ को। इस मामले में जोया का कोई सानी नहीं। हाल में हुए फिल्मफेयर अवॉर्डस में उनकी फिल्म ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा ने सर्वश्रेठ निर्देशन समेत सात पुरस्कार हासिल किए हैं। मुंबई के सोफिया कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में ग्रेजुएट रीमा कागती ने पहली फिल्म हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड से लोगों का दिल जीत लिया था। शुरुआत में वो इतने सारे फिल्मी सितारों के साथ काम करने, उन्हें निर्देशित करने की कल्पना मात्र से आशंकित हो गई थीं। पहले दिन बोमन ईरानी और शबाना के साथ शूटिंग थी। वे घबराई हुई थीं, लेकिन जल्द ही सबकुछ ठीक हो गया। बतौर निर्देशक उनकी दूसरी फिल्म तलाश है। इसमें आमिर खान, करीना कपूर और रानी मुखर्जी मुख्य भूमिकाओं में हैं।
 

Thursday, April 19, 2012

नसीरूद्दीन शाह:अभिनय की चलती-फिरती पाठशाला



 नसीरूद्दीन शाह इस नाम का जिक्र होते ही एक ऐसे साधारण पर आकर्षक व्यक्तित्व की छवि सामने आती है जिसकी अभिनय-प्रतिभा अतुलनीय है, जिसके चेहरे का तेज असाधारण है और हिन्दी सिनेमा में जिसके योगदान को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
नसीरूद्दीन  शाह हिन्दी सिनेमा जगत  की कालजयी  शख्सियतों  की सूची में शुमार हैं। वे अभिनय की चलती-फिरती पाठशाला हैं। कई स्थापित अभिनेताओं  के वे प्रेरणास्रोत  रहे हैं तो कई नवोदित अभिनेता उनकी अभिनय-कला से प्रेरित होकर हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जमीन तलाश रहे हैं। पद्म भूषण और पद्म श्री से सम्मानित हो चुके नसीरूद्दीन  शाह की किसी फिल्म में उपस्थिति मात्र ही उस फिल्म की गुणात्मकता का संकेत देती है।
सैन्य पारिवारिक पृष्ठभूमि में बचपन गुजारने के बाद नसीरूद्दीन  शाह ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। और फिर उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का रूख  किया। अभिनय के इस प्रतिष्ठित संस्थान से अभिनय का विधिवत प्रशिक्षण लेने के बाद वे रंगमंच  और हिन्दी फिल्मों में सक्रिय हो गएं। नसीरूद्दीन  शाह की फिल्मों की सूची में समानांतर और मुख्य धारा की फिल्मों का अनूठा सम्मिलन  देखने को मिलता है। उनके फिल्मी सफर का प्रारंभ निशांत,मंथन और भूमिका जैसी समानांतर फिल्मों से हुआ। उन्होंने अपने फिल्मी सफर के शुरूआती लम्हों में ही परिपक्व अभिनय का परिचय दिया और देखते-ही-देखते वे तात्कालिक सिनेमा जगत  के सर्वाधिक प्रतिभाशाली अभिनेताओं  में शुमार हो गए। धीरे-धीरे वे समानांतर फिल्मों की जरूरत बन गए। उनकी अनुपस्थिति में समानांतर फिल्मों की कल्पना करना भी मुश्किल हो गया। भवनी भवाई,स्पर्श,अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?,मासूम,अ‌र्द्धसत्य,मंडी,पेस्टॅनजी में नसीरूद्दीन  शाह ने अभिनय की नयी परिभाषा गढ़ी। कला-फिल्मों के साथ-साथ उन्होंने मुख्य धारा की फिल्मों की ओर रूख  करना प्रारंभ किया। शुरूआत हुई हम पांच से। हम पांच के बाद उन्होंने दिलीप कुमार अभिनीत कर्मा में अभिनय का रंग भरा। धीरे-धीरे वे मुख्य धारा की फिल्मों में एकल नायक की भूमिका निभाने लगें। ऐसी फिल्मों में इजाजत,जलवा,हीरो हीरालाल उल्लेखनीय है।
नसीरूद्दीन  शाह के फिल्मी सफर में एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्होंने मसाला हिन्दी फिल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कोई हिचक नहीं दिखायी। ऐसी फिल्मों में गुलामी,त्रिदेव,विश्वात्मा और मोहरा उल्लेखनीय हैं। वक्त के साथ नसीरूद्दीन  शाह ने फिल्मों के चयन में पुन: सतर्कता बरतनी शुरू कर दी। वे कम मगर, अच्छी  फिल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगें।  वे समझने लगें  कि अब,वह दौर आ गया है जब कला-फिल्मों और व्यावसायिक फिल्मों के बीच की दूरियां खत्म हो रही है। इसी दौर में उन्हें हे राम में महात्मा गांधी की भूमिका निभाने का मौका मिला।
उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी की भूमिका निभाना उनके लिए एक सपने के पूरे होने की तरह था। हिन्दी फिल्मों में अभिनय के साथ-साथ नसीरूद्दीन  शाह रंगमंच  में भी सक्रिय रहें। साथ ही, उन्होंने छोटे पर्दे के दो कालजयी  धारावाहिकों भारत एक खोज और मिर्जा गालिब में भी अपने शानदार अभिनय का रंग  भरा। जब,उन्होंने हिन्दी फिल्मों में अभिनय के वर्षो के अनुभव को रचनात्मक मोड़ देने का निर्णय लिया तब,फिल्म-निर्देशन की बागडोर संभालने की योजना उन्होंने बनायी। यूं होता तो क्या होता? के प्रदर्शन के साथ ही नसीरूद्दीन शाह अभिनेता के साथ-साथ निर्देशक भी बन गएं। हालाकि,निर्देशन के क्षेत्र में उनके पहले प्रयास को दर्शकों के व्यापक वर्ग की प्रशंसा नहीं मिली,पर समीक्षकों की कसौटी पर यह फिल्म पूरी तरह खरी उतरी। नसीरूद्दीन  शाह की अभिनय-प्रतिभा भारत तक ही सीमित नहीं रही। अंतरराष्ट्रीय फिल्म परिदृश्य में भी नसीरूद्दीन सक्रिय रहे हैं। हॉलीवुड फिल्म द लीग ऑफ एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी जेंटलमैन और पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए ऐसी अंतरराष्ट्रीय फिल्में हैं जिसमें नसीरूद्दीन  शाह ने अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करायी।
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित हो चुके नसीरूद्दीन  शाह आज भी अपने अभिनय से दर्शकों को दांतों तले ऊंगलियां दबाने के मौके देते हैं। ए वेडनेसडे  में एक आम आदमी के दर्द और उसके आक्रोश को जीवंत बनाने वाले नसीरूद्दीन  शाह के अभिनय का जादू ही था कि क्या बूढ़े? क्या युवा? सभी ने बिना इस स्टार-रहित फिल्म को देखने के लिए बार-बार सिनेमाघरों का रूख  किया। उम्मीद है,आने वाले कई वर्षो तक अभिनय-जगत में नसीरूद्दीन  शाह की सक्रियता बरकरार रहेगी और वे यूं ही हिन्दी फिल्मों में अपनी प्रभावी उपस्थिति से दर्शकों को कृतज्ञ करते रहेंगे।

पुरस्कार

  • नसीरूद्दीन शाह को 1987 में पद्म श्री और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है।
  • 1979 में फ़िल्म स्पर्श और 1984 में फ़िल्म पार के लिए उन्हें सर्वोत्कृष्ट अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
  • 1981 में आक्रोश, 1982 में चक्र, 1984 में मासूम, 1985 में पार तथा  अ वेनस्डे के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के अवार्ड से सम्मानित किया गया।
  • फ़िल्म इक़बाल के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता के राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

अनुराधा पटेल की वापसी




गिरीश कर्नाड निर्देशित उत्सव और गुलजार निर्देशित इजाजत में अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाओं से याद रह जाने वाली अभिनेत्री अनुराधा पटेल एक अरसे बाद सक्रियता के साथ लौटी हैं। हाल ही में सलमान खान अभिनीत फिल्म रेडी और पिछले हफ्ते प्रदर्शित एक उल्लेखनीय फिल्म खाप में वे नजर आयी हैं। दो अलग-अलग तरह के किरदार उनको इन फिल्मों में करने को मिले जिसमें वे अपनी पहचान रेखांकित करती हैं। रेडी, अलग मिजाज की मजेदार फिल्म है, उसमे उनका कैरेक्टर हल्का-फुल्का है लेकिन खाप में वे गम्भीर भूमिका में दिखायी देती हैं।

अनुराधा पटेल, भारतीय सिनेमा के महानायक दादामुनि अशोक कुमार की नातिन हैं। अभिनेता कँवलजीत से उन्होंने विवाह किया है। लम्बे समय सिनेमा में सक्रिय रहने के बाद नब्बे के दशक से ही उन्होंने काम करना कम कर दिया था। 2000 के बाद भी उनका काम करना लगभग नगण्य सा रहा लेकिन इस बीच उनको मिले अनुबन्ध और उनकी सक्रियता ने यह साबित किया है कि अब वे पारिवारिक जवाबदारियों से फारिग होकर एक बार फिर इस दौर को अपने लिए आजमाना चाहती हैं। अपने नाना अशोक कुमार की जन्मशताब्दी वर्ष में, जो कि इस साल अक्टूबर तक चल रहा है, वे उन पर केन्द्रित कई समारोहों में भी शामिल हुईं।


पिछले साल गोवा अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में भी अनुराधा ने अशोक कुमार के प्रति आदरांजलि व्यक्त करने वाले उस सत्र में हिस्सा लिया था जिसमें उनकी अविस्मरणीय फिल्मों के प्रदर्शन हुए थे। अनुराधा पटेल की क्लैसिक उत्सव 1984 में प्रदर्शित हुई थी जिसमें उन्होंने रेखा की सखी की भूमिका निभायी थी। गिरीश कर्नाड ने इस एपिक को बड़े ही कलात्मक ढंग से निर्देशित किया था। गुलजार की इजाजत तो जैसे स्मृतियों में प्रेम-कविता की तरह थी जिसमें नसीर की प्रेमिका के रूप में अनुराधा के पूर्वदीप्ति (फ्लैश बैक) के जितने भी प्रसंग हैं, वो भुलाये नहीं भूलते। मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास रखा है, गाना गहरे मर्म तक उतरता है, अनुराधा पर ही फिल्माया गया है।

अनुराधा पटेल ने बंधन अनजाना, अनंत यात्रा, सदा सुहागन, तोहफा मोहब्बत का, जेंटलमेन, हमारी बेटी आदि फिल्मों में काम किया है। एक अन्तराल बाद वे 2007 में फिल्म दस कहानियाँ में दिखायी दीं। एक सिलसिला फिर बना और फिर इट्स माय लाइफ, जाने तू या जाने ना, आयशा में उन्होंने काम किया, फिर रेडी और खाप जिसका कि जिक्र हमने ऊपर किया। राजकुमार सन्तोषी की पावर भी उनकी आने वाली फिल्मों में से एक है।